May 2, 2026

द लैंसेट पब्लिक हेल्थ : कोरोना संक्रमित व्यक्ति में लंबे समय तक बेड पर रहने से मानसिक स्वास्थ्य का खतरा…

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कोरोना से संक्रमित व्यक्ति के 7 दिन या उससे अधिक समय तक बेड पर रहने वाले लोगों में थकावट और चिंता की दर उन लोगों की तुलना में ज्यादा है, जो कोरोना संक्रमित हुए, लेकिन उन्होंने कभी बेड का सहारा नहीं लिया। बता दें की ये जानकारी द लैंसेट पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित एक नए अध्ययन से सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, वायरस सार्स-सीओवी-2 से संक्रमित व्यक्ति जो कभी अस्पताल में भर्ती नहीं हुए, वे रिकवर होने के बाद 16 महीने तक थकावट में रहे।ये उन लोगों की तुलना में अधिक है जो कभी संक्रमित नहीं हुए।


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जबकि अस्पताल में भर्ती नहीं हुए मरीजों के लिए थकावट और चिंता के लक्षण ज्यादातर दो महीने के अंदर कम हो जाते हैं, जबकि 7 दिनों या उससे ज्यादा समय तक बेड पर रहने वालों में 16 महीने तक थकावट और चिंता का अनुभव होने की संभावना 50-60 प्रतिशत ज्यादा होती है। शरीर में कोरोना के लक्षणों की त्वरित रिकवरी आंशिक रूप से समझा सकती है कि हल्के संक्रमण वाले लोगों के लिए मानसिक स्वास्थ्य के लक्षण समान दर से क्यों घटते हैं।



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लेकिन, गंभीर कोरोना वाले मरीजों में अक्सर सूजन की संभावना होती हैं जो पहले भी मानसिक स्वास्थ्य प्रभावों खासकर अवसाद से जुड़ा हुआ है। आइसलैंड विश्वविद्यालय से इंगिबजॉर्ग मैग्नसडॉटिर ने कहा, ‘कोरोना के मरीजों में अवसाद और चिंता की समस्या उनमें ज्यादा होती है, जिन्होंने सात दिन या उससे अधिक समय बेड पर बिताया हो।’ लंबे समय तक मानसिक स्वास्थ्य प्रभावों को देखने के लिए शोधकर्ताओं ने 0-16 महीनों से कोरोना ठीक होने के साथ और बिना लोगों में अवसाद, चिंता, कोरोना संबंधित परेशनी और खराब नींद की गुणवत्ता के लक्षण फैलते हुए देखा।

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गौरतलब हैं की ये विश्‍लेषण डेनमार्क, एस्टोनिया, आइसलैंड, नॉर्वे, स्वीडन और यूके में 7 समूहों में 247,249 लोगों से इकट्ठा किया गया। कोरोना से ठीक होने वाले लोगों में उन व्यक्तियों की तुलना में अवसाद और खराब नींद की गुणवत्ता का अधिक है, जो कभी जांच नहीं हुई। विश्वविद्यालय के प्रोफेसर उन्नूर अन्ना वाल्दीमार्सडॉटिर ने कहा, ‘हमारा शोध निदान के 16 महीने बाद तक सामान्य आबादी में एक गंभीर कोरोना बीमारी के बाद मानसिक स्वास्थ्य के लक्षणों का पता लगाने वाला पहला शोध है।’

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महत्वपूर्ण कारक-

प्रोफेसर उन्नूर ने कहा, ‘ यह बताता है कि मानसिक स्वास्थ्य प्रभाव सभी कोरोना रोगियों के लिए समान नहीं हैं और बेड पर बिताया गया समय मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों की गंभीरता को निर्धारित करने में एक महत्वपूर्ण कारक है। हम महामारी के तीसरे साल में प्रवेश कर रहे हैं। कोरोना की गंभीर बीमारी वाले रोगियों के अनुपात में प्रतिकूल मानसिक स्वास्थ्य में वृद्धि हुई है और संक्रमण के बाद पहले साल से आगे अनुवर्ती अध्ययन देखभाल के लिए समय पर पहुंच सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण हैं।’

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