होलिका दहन: ऐसा मंदिर जहां की अखंड ज्योति से जलाते हैं होलिका, माचिस की तीली का नहीं करते उपयोग…
होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है माना जाता है कि होलिका दहन की अग्नि में आहुति देने से जीवन की नकारात्मकता समाप्त होती है। वहीं बता दें की राजा मोरध्वज ने जिस महामाया मंदिर की स्थापना की थी, वहां होलिका दहन पर अनोखी परंपरा निभाई जाती है। मंदिर में वर्षों से प्रज्ज्वलित हो रही अखंड ज्योति से अग्नि लेकर ही होलिका दहन किया जाता है। यहां तक कि इस होलिका दहन में मचिस की तीली का उपयोग नहीं किया जाता।
राजधानी रायपुर में महामाया मंदिर के पुजारी पंडित मनोज शुक्ला बताते हैं कि अखंड ज्योति से अग्नि लेकर होलिका दहन करने की यह परंपरा सालों से निभाई जा रही है। खास बात यह है कि मंदिर में होलिका दहन होने के बाद ही मंदिर के आसपास के इलाकों में दहन किया जाता है। होलिका दहन के बाद होलिका की अग्नि ले जाकर दूसरे जगह दहन करते हैं।
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भद्रा काल-
होलिका दहन में मुहूर्त को विशेष महत्व देते है, यदि भद्रा काल हो तो दहन तब किया जाता है, जब भद्रा काल समाप्त हो जाए। इस साल आधी रात तक भद्रा है, इसलिए होलिका दहन भी आधी रात बाद ही किया जाएगा।
पूजा-
होलिका दहन से पहले प्रथम पूज्य भगवान गणेश, भगवान नृसिंह, प्रहलाद और बुआ होलिका की पूजा करके सुख समृद्धि की प्रार्थना की जाती है।इसके बाद पुजारीगण होलिका का दहन गर्भगृह में प्रज्वलित अखंड ज्योति से अग्नि लाकर जयकारे लगाते हुए होलिका दहन करते है। इसके बाद पुरानी बस्ती के लिली चौक, लोहार चौक, अमीनपारा चौक, बंधवापारा, लाखेनगर, कंकालीपारा, कुशालपुर, ब्रह्मपुरी सहित अन्य इलाकों में धूमधाम से होलिका दहन किया जाता है।
मंदिर परिसर में वसंत पंचमी के दिन अंडा पेड़ गाड़ा गया था। जहां यह पेड़ गाड़ते हैं, वहीं पर लकड़ियां एकत्रित करके होलिका दहन किया जाता है। यह परंपरा छत्तीसगढ़ के हर गांव में निभाई जाती है। कई जगह होलिका दहन से पूर्व अंडा पेड़ गाड़कर वहां लकड़ियां लाकर दहन किया जाएगा।


