श्रमिकों की मृत्यु दर कम करने वरदान साबित हो रहा NIT का मॉडल…
कोयला खदानों के हादसों को रोकने के लिए जांच का तरीका सफल हो रहा है। इसके लिए तय विशेष मानक में 60 चरण हैं। नेशनल इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी रायपुर के खनिकर्म अभियांत्रिकी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. आशीष कुमार दास के नेतृत्व में तैयार प्रविधि (स्टैंडर्ड एक्सीडेंट इंवेस्टीगेशन मेथडालाजी) का प्रयोग शुरू हो गया है। खान सुरक्षा महानिदेशालय पिछले दो सालो से खदानों में हुए हादसों की जांच में इसका प्रयोग कर रहा है। इससे एक ही तरह की दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति पर रोक लगी है। देश में खदानों की दुर्घटनाओं में प्रतिवर्ष करीब डेढ़ सौ लोगों की मौत हो जाती है जबकि ढाई सौ से अधिक गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं।
अब तक कोयला खदानों में होने वाली दुर्घटनाओं की जांच व्यक्तिगत रूप से कोई विशेषज्ञ करता रहा है। अलग-अलग दुर्घटनाओं में अलग-अलग तरह से जांच और उससे बचाव के लिए अनुशंसा की जाती रही है। इससे दुर्घटनाओं का मूल कारण पता करने में दिक्कत महसूस की जा रही थी। इसके चलते सुरक्षा के सटीक मानक भी तय नहीं हो पा रहे थे। ऐसे में एक ऐसे मानक की मांग लगातार हो रही थी जो दुर्घटनाओं के मूल कारणों की जांच करे और उससे बचाव का रास्ता भी बताए। बता दें कि कोयला एवं खनन मंत्रालय दुर्घटनाओं को लेकर चिंतित है। उसने श्रमिकों की मृत्यु दर को शून्य करने का लक्ष्य रखा है। एनआइटी का यह माडल वरदान साबित हो रहा है।
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डा. आशीष कुमार दास ने बताया कि यह कोई उपकरण आधारित नहीं, बल्कि वैचारिक माडल है। इसे तैयार करने में पांच साल से अधिक समय लगा। खदानों के भीतर जाकर इस माडल के लिए 60 चरण बनाए गए। फिर कंप्यूटराइज्ड टूल्स तैयार किए गए। इसमें पहले व्यक्ति, वातावरण और फिर उपकरण के जरिए बचाव के रास्ते बताए गए हैं। इसके जरिए खदानों में सुरक्षा के क्या उपाय किए जाएं, यह दुर्घटना की जांच के बाद स्वमेव ही तय हो जाता है। इससे उस तरह की दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने में हम सफल भी हो रहे हैं।

