May 1, 2026

छत्तीसगढ़: वन और रेवेन्यू विभाग के सर्वे में नज़र आई लुप्त हो चुकी गिद्धों की प्रजाति….

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गिद्धों की लुप्त प्रजाति ‘इजीप्शियन वल्चर’ छत्तीसगढ़ के बिलासपुर और मुंगेली के बाद पहली बार दुर्ग जिले के धमधा ब्लॉक में देखा गया है। बता दें इजीप्शियन वल्चर के गर्दन में सफेद बाल होते हैं। इनका आकार थोड़ा छोटा होता है। ब्रीडिंग के वक्त इनकी गर्दन थोड़ी सी नारंगी हो जाती है।

इससे जिले में इसके संरक्षण की उम्मीदें और बढ़ गई हैं। वहीं कलेक्टर डॉ. एसएन भुरे ने इस प्रजाति के संरक्षण के लिए वन विभाग और रेवेन्यू विभाग को मिलकर ‘वल्चर रेस्टारेंट’ के लिए जगह को चुना गया और उसे बनाने के निर्देश दिए हैं।

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डीएफओ धम्मशील गणवीर ने कहा कि इजीप्शियन प्रजाति के गिद्ध वहां मौजूद बड़े पेड़ों में घोंसला बनाकर रह रहे हैं। इनकी प्रजाति के संरक्षण और संवर्धन के लिए यह एक अच्छा संकेत है। उन्होंने कहा कि इसी मसले पर उन्होंने कलेक्टर डॉ. भुरे के साथ बुधवार को खोज किया है।



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इसके बाद दोनों अधिकारियों ने ऐसे क्षेत्रों में जहां ‘इजीप्शियन वल्चर’ की बसाहट सबसे अधिक पाई गई है वहां इनके कंजर्वेशन के लिए संरक्षित क्षेत्र बनाने का निर्णय लिया है। कलेक्टर ने रेवेन्यू डिपार्टमेंट की मदद से इसके लिए जगह चिह्नांकित करने का निर्णय लिया है। इसके बाद बुधवार को फारेस्ट और रेवेन्यू की संयुक्त टीम ने धमधा ब्लॉक जाकर जगह चिह्नांकन के लिए सर्वे का कार्य किया है।

गिद्धों के लिए अनुकूल ‘वल्चर रेस्टारेंट’ बनाया जाएगा-

डीएफओ गणवीर ने बताया कि इजीप्शियन वल्चर की प्रजाति दुर्ग ही नहीं छत्तीसगढ़ में दिखाई देना एक बड़ी बात है। यह एक दुर्लभ प्रजाति है। इसके संरक्षण की जरूरत है। इसके लिए एक खास क्षेत्र ‘वल्चर रेस्टारेंट’ बनाया जाएगा। गिद्ध मृतभक्षी होते हैं। इनके भोजन के लिए मरने वाले जानवरों को यहां लाया जाएगा। यहां ऐसे पौधे लगाये जाएंगे जो गिद्धों की बसाहट के अनुकूल होंगे। गिद्ध पीपल जैसे ऊंचे पेड़ों में बसाहट बनाते हैं। कंजर्वेशन वाले क्षेत्र में भी इसी तरह के पौधे लगाए जाएंगे। ‘वल्चर रेस्टारेंट’ में उस हर सुविधा का विकास होगा जो गिद्धों की बसाहट के लिए उपयोगी होगी।

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संख्या में आई थी भारी गिरावट-

डीएफओ गणवीर ने बताया कि भारत में गिद्धों की 9 प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें इजीप्शियन वल्चर भी एक प्रजाति है। यह छोटे आकार के गिद्ध होते हैं। बताया कि भारत में पहले बड़ी संख्या में गिद्ध पाये जाते थे। दशक भर से पहले इनमें तेजी से गिरावट आई। इसका कारण था डाइक्लोफिनाक औषधि जो मवेशियों को दी जाती थी। मवेशियों के मरने के बाद जब गिद्ध इनके गुर्दे खाते थे तो यह औषधि भी उनके पेट में चली जाती थी और इससे उनकी मौतें होने लगीं। इसी को देखते हुए देश भर में इस औषधि पर प्रतिबंध लगा दिया गया। अब इनके संरक्षण के लिए की योजना पर कार्य किया जा राह है।

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