August 12, 2026

अनंत विभूषित श्री रवि शंकर महाराज जी ने भक्तो के साथ माँ राजराजेश्वरी ‘ललिताम्बिका’ का विभिन्न सामग्रियों से किया एक लाख अर्चन…..

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रायपुर : श्री रावतपुरा सरकार लोक कल्याण ट्रस्ट के श्री रावतपुरा सरकार आश्रम रायपुर, चित्रकूट और रावतपुरा धाम में माँ राजराजेश्वरी ‘ललिताम्बिका’ का बड़े विधि विधान और विभिन्न सामग्रियों से एक लाख अर्चन किया गया।

अनंत विभूषित श्री रवि शंकर महाराज जी ने इस अनुष्ठान के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि मां राजराजेश्वरी ‘‘ललिताम्बिका’’ के अर्चन का विशेष महत्व है. ललिता सहस्त्रनाम में मां के 1008 नामों का वर्णन है. ललिता सहस्त्रनाम को शिव-पार्वती ने गाया है।

देवताओं ने भी उसका श्रवण और पठन-पाठन किया है, जिसके बाद जीवन को एक सकारात्मकता देने वाली ये युक्ति मानवों को मिली है. दक्षिण भारत में ललिता सहस्त्रनाम का पाठ और अर्चन किया जाता है, लेकिन उत्तर भारत में इसका आभाव है.

ऐसे आयोजनों के माध्यम से इसे जन-जन तक ले जाने का लक्ष्य है. इसलिए मां राजराजेश्वरी ‘‘ललिताम्बिका’’ के लक्ष्यार्चन अनुष्ठान का आयोजन किया गया है.

दैवीय शक्ति से परिपूर्ण ललिता सहस्त्रनाम अनुष्ठान मनुष्य के विकारों को नष्ट कर नए सकारात्मक विचारों को सृजित करता है, जिससे प्राणियों को असीम शांति का अनुभव होने के साथ उनकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.

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विशेष साहित्य : ललिता सहस्त्रनाम का विशेष महत्व : 

श्री ललिता सहस्त्रनाम का विशेष महत्व है,श्री ललिता सहस्त्रनाम के पाठ से इष्टदेवी प्रसन्न हो जाती है और उपासक की कामना को पूर्ण करती है,यदि उपासक नित्य पाठ न कर सके तो पूण्य दिवसों पर संक्रांति पर दीक्षा दिवस पर,पूर्णिमा पर,शुक्रवार को अपने जन्मदिवस पर,दक्षिणायन ,उत्तरायण के समय ,नवमी चतुर्दशी आदि को अवश्य पाठ करें।पूर्णिमा के दिन श्री चन्द्र बिम्ब में श्री जी का ध्यान कर पंचोपचार पूजा के उपरान्त पाठ करने से साधक के समस्त रोग नष्ट हो जाते है,और वह दीर्घ आयु होता है, हर पूर्णिमा को यह प्रयोग करने से ये प्रयोग सिद्ध हो जाता है।

इसी प्रकार सहस्त्रनाम से अभिमंत्रित जल से अभिषेक करने से दुखी मनुष्यो की पीड़ा शांत हो जाती है अथार्त किसी पर कोई ग्रह या भूत,प्रेत चिपट गया हो तो अभिमंत्रित जल के अभिषेक से वे समस्त पीड़ाकारक तत्व दूर भाग जाते है,सुधासागर के मध्य में श्री ललिताम्बा का ध्यान कर पंचोपचार पूजन करके पाठ सुनाने से सर्प आदि की विष पीड़ा भी शांत हो जाती है,वन्ध्या (बाँझ)स्त्री को सहस्त्रनाम से अभिमंत्रित माखन खिलाने से वह शीघ्र गर्भ धारण करती है!

नित्य पाठ करने वाले साधक को देखकर जनता मुग्ध हो जाती है। पाठ करने वाले साधक के शत्रुओं वाकस्तम्भन कर देती है,साधक के शत्रु चाहे वो राजा ही क्यों न हो माँ दण्डिनी उसे नष्ट कर देती है।छः मास पर्यंत पाठ करने से साधक के घर में लक्ष्मी स्थिर हो जाती है।एक मास पर्यंत तीन बार पाठ करने से सरस्वती साधक की जिभ्या पर विराजने लगती है।निस्तन्द्र होकर एक पक्ष पर्यंत सहस्त्रनाम का पाठ करने से साधक में वशीकरण शक्ति आ जाती है।

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सहस्त्रनाम के साधक की दृष्टि पड़ने से पापियों के पाप नष्ट हो जाते है।अन्न,वस्त्र,धन,धान्य,दान आदि सत्पात्र को ही देना चाहिए।जो उपासक श्रीचक्रराज में श्री विद्या माँ का पूजन कर सहस्त्रनाम से पदम्,कमल,गुलाब,तुलसी की मंजरी,चम्पक ,जाती,मल्लिका,कनेर,कुंद, केबड़ा,केशर उत्प्ल, पातल,बिलपत्र,माध्वी,केतिकी ,और अन्य सुंगंधित पुष्पो से माँ का अर्चन करता है उसके पूण्य को भगवान शिव भी नही कह सकते।

जो पूर्णिमा के दिन श्रीचक्रराज में माँ श्रीविद्या का सहस्त्रनाम से अर्चन करता है वो स्वयं श्री ललिताम्बा स्वरूप हो जाता है।महानवमी के दिन श्रीचक्रराज में सहस्त्रनाम से अर्चन करने से मुक्ति हस्तगत होती है।शुक्रवार के दिन श्रीचक्रराज में सहस्त्रनाम से माँ का अर्चन करने वाला अपनी समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण कर सब प्रकार के सौभाग्य युक्त पुत्र और पौत्रों से सुशोभित होकर विविध सुखों को भोगता हुआ मुक्ती को प्राप्त होता है।

निष्काम पाठ करने से ब्रह्मज्ञान पैदा होता है जिससे साधक आवागमन के बंधन से मुक्त हो जाता है।सहस्त्रनाम का पाठ करने से धनकामी धन को विद्यार्थी विद्या को यशकामी यश को प्राप्त करता है,धर्मानुष्ठान से रहित पापो की बहुलता से युक्त इस कलियुग में श्री ललिता सहस्त्रनाम के पाठ किये बिना जो साधक माँ की कृपा चाहता है वो मुर्ख है,वो बिना नेत्रों से रूप को देखना चाहता है।जो पराम्बा का भक्त बनना चाहता उसे नित्यमेव श्री ललिता सहस्त्रनाम का पाठ अवश्य करना चाहिए।

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