सावन मास को सर्वोत्तम मास कहा जाता है।
ऋषि मरकंडु के पुत्र मारकण्डे ने लंबी आयु के लिए सावन मास में भयंकर तपस्या की थी।
भगवान शिव पृथ्वी पर अवतरित हो कर ससुराल आये थे वहां उनका स्वागत अर्ध्य और जलाभिषेक से किया गया था।
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सावन मास में ही समुद्र मंथन किया गया था। जहां समुद्र से निकले हलाहल विष को भगवान शिव द्वारा कंठ में समाहित किया।
विषपान से शिव जी का कंठ नीलवर्ण हो गया, जिससे उनका नाम " नीलकंठ " पड़ा।
विष के प्रभाव को कम करने सभी देवी-देवताओ द्वारा उन पर जल अर्पित किया गया था।
कहा जाता है शिव जी को जल चढ़ाने से अच्छे फल की प्राप्ति होती हैं।